नई दिल्ली का इतिहास | New Delhi Ka Itihas

नई दिल्ली का इतिहास | New Delhi Ka Itihas

1803 में अंग्रेजों ने मराठों को हराकर दिल्ली पर नियंत्रण हासिल कर लिया था। क्योंकि ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता थी इसलिए मुगल बादशाह को लाल किले के महल में रहने की छूट मिली हुई थी। आज हमारे सामने जो आधुनिक शहर दिखाई देता है यह 1911 में तब बनना शुरू हुआ जब दिल्ली ब्रिटिश भारत की राजधानी बन गयी।

एक अतीत का ध्वंस
1857 से पहले दिल्ली के हालात दूसरे औपनिवेशिक शहरों से काफी अलग थे। मद्रास, बम्बई या कलकत्ता में भारतीयों और अंग्रेजों की बस्तियाँ अलग-अलग होती थीं। भारतीय लोग काले इलाकों में और अंग्रेज लोग सुसज्जित गोरे इलाकों में रहते थे। दिल्ली में ऐसा नहीं था। ख़ासतौर से उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में दिल्ली के अंग्रेज भी पुराना शहर के भीतर अमीर हिंदुस्तानियों के साथ ही रहा करते थे। वे भी उर्दू / फारसी संस्कृति व शायरी का मजा लेते थे और स्थानीय त्योहारों में हिस्सेदारी करते थे।

1824 में दिल्ली कॉलेज की स्थापना हुई जिसकी शुरूआत अठारहवीं सदी में मदरसे के रूप में हुई थी। इस संस्था ने विज्ञान और मानवशास्त्र के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया। यहाँ मुख्य रूप से उर्दू भाषा में काम होता था। बहुत सारे लोग 1830 से 1857 की अवधि को दिल्ली पुनर्जागरण काल बताते हैं।

1857 के बाद यह सब कुछ बदल गया। उस साल हुए विद्रोह के दौरान विद्रोहियों ने बहादुर शाह जफर को विद्रोह का नेतृत्व सँभालने के लिए मजबूर कर दिया। चार महीने तक दिल्ली विद्रोहियों के नियंत्रण में रही।

जब अंग्रेजों ने शहर पर दोबारा नियंत्रण हासिल किया तो वे बदले और लूटपाट की मुहिम पर निकल पड़े। प्रसिद्ध शायर गालिब उदास मन से इन घटनाओं को देख रहे थे। 1857 में दिल्ली की तबाही को उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया,

"जब गुस्साए शेर (अंग्रेज) शहर में दाखिल हुए तो उन्होंने बेसहारों को मारा... घर जला डाले। न जाने कितने औरत-मर्द, आम और ख़ास, तीन दरवाजों से दिल्ली से भाग खड़े हुए और उन्होंने छोटे-छोटे समुदायों तथा शहर के बाहर मकबरों में पनाह ली। "

अगली बगावत को रोकने के लिए अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को देश से निकाल दिया। अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्याँमार) भेज दिया, उनका दरबार बंद कर दिया, कई महल गिरा दिए, बागों को बंद कर दिया और उनकी जगह अपने सैनिकों के लिए बैरकें बना दीं। अंग्रेज दिल्ली के मुगल अतीत को पूरी तरह भुला देना चाहते थे। किले के इर्द-गिर्द का सारा इलाका साफ कर दिया गया। वहाँ के बाग, मैदान और मसजिदें नष्ट कर दिए गए ।

अंग्रेज आसपास के इलाके को सुरक्षित करना चाहते थे। ख़ासतौर से मसजिदों को या तो नष्ट कर दिया गया या उन्हें अन्य कामों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। मिसाल के तौर पर, जीनत-अल-मसजिद को एक बेकरी में तब्दील कर दिया गया। जामा मसजिद में पाँच साल तक किसी को नमाज की इजाजत नहीं मिली। शहर का एक-तिहाई हिस्सा ढहा दिया गया। नहरों को पाटकर समतल कर दिया गया।

रेलवे की स्थापना करने और शहर को चारदीवारी के बाहर फैलाने के लिए 1870 के दशक में शाहजहाँनाबाद की पश्चिमी दीवारों को तोड़ दिया गया। अब अंग्रेज उत्तर की तरफ विकसित हुए विशाल सिविल लाइंस इलाके में रहने लगे। अब वे पुराने शहर में भारतीयों के साथ नहीं रहते थे। दिल्ली कॉलेज को एक स्कूल बना दिया गया और 1877 में उसे बंद कर दिया गया।

एक नयी राजधानी की योजना
अंग्रेजों को दिल्ली के सांकेतिक महत्व का अच्छी तरह पता था। लिहाजा, 1857 की बगावत के बाद उन्होंने यहाँ बहुत सारे शानदार आयोजन किए। 1877 में वायसरॉय लिटन ने रानी विक्टोरिया को भारत की मलिका घोषित करने के लिए एक दरबार का आयोजन किया। वैसे तो ब्रिटिश भारत की राजधानी अभी भी कलकत्ता ही थी लेकिन इस विशाल दरबार का आयोजन दिल्ली में किया गया। इसकी क्या वजह रही होगी?

विद्रोह के दौरान अंग्रेजों ने यह समझ लिया था कि लोगों की नजर में मुगल बादशाह का महत्व अभी भी बना हुआ है और वे उसे ही अपना मुखिया मानते हैं। लिहाजा, ब्रिटिश सत्ता का मुगल बादशाहों और 1857 के बागियों के मुख्य केंद्र में पूरी तड़क-भड़क के साथ प्रदर्शन किया गया। 1911 में जब जॉर्ज पंचम को इंग्लैंड का राजा बनाया गया तो इस मौके पर दिल्ली में एक और दरबार का आयोजन हुआ। कलकत्ता की बजाय दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने के फैसले का भी इसी दरबार में ऐलान किया गया। तत्कालीन शहर के दक्षिण में रायसीना पहाड़ी पर दस वर्ग मील के इलाके में नयी दिल्ली का निर्माण किया गया।

एडवर्ड लटयंस और हर्बर्ट बेकर नाम के दो वास्तुकारों को नयी दिल्ली और उसकी इमारतों का डिजाइन तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया। नयी दिल्ली स्थित सरकारी परिसर में दो मील का चौड़ा रास्ता, वायसरॉय के महल (वर्तमान राष्ट्रपति भवन) तक जाने वाला किंग्सवे (वर्तमान राजपथ), और उसके दोनों तरफ सचिवालय की इमारतें बनाई गईं। इन सरकारी इमारतों की बनावट में भारत के शाही इतिहास के अलग-अलग दौर की झलक दिखायी देती थी। फिर भी इसका रूप मोटे तौर पर क्लासिकी यूनान (पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व) का दिखाई देता था।

उदाहरण के लिए, वायसरॉय पैलेस का केंद्रीय गुंबद साँची में बने बौद्ध स्तूप की बनावट पर आधारित था। लाल भुरभुरे पत्थर और नक्काशीदार जालियों की प्रेरणा मुगल वास्तुशिल्प से ली गई थी। लेकिन नयी इमारतों में ब्रिटिश प्रभुत्व की झलक भी जरूरी थी। इसीलिए वास्तुकारों ने इस बात का खयाल रखा कि वायसरॉय का महल शाहजहाँ की जामा मसजिद से भी ऊँचा हो! यह काम कैसे किया जा सकता था?

नयी दिल्ली के निर्माण में लगभग 20 साल लगे। इरादा एक ऐसा शहर बनाने का था जो शाहजहाँनाबाद के मुक़ाबले बिलकुल अलग हो। उसमें भीड़ भरे मोहल्लों और संकरी गलियों के लिए कोई जगह नहीं थी। नयी दिल्ली में चौड़ी, सीधी सड़कों और विशाल परिसरों के बीच बड़ी-बड़ी इमारतों की कल्पना की गई थी। पुरानी दिल्ली में अफरा - तफरी  दिखाई देती थी। नया शहर स्वच्छ और स्वस्थ दिखाई पड़ता था। अंग्रेजों को भीड़ भरे इलाके गंदे और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बीमारियों का श्रोत दिखाई देते थे। इसीलिए नयी दिल्ली में बेहतर जलापूर्ति, गंदगी के निकास और नालियों की पूरी व्यवस्था तैयार की गई। उसे ज़्यादा हरा-भरा बनाया गया। वहाँ पेड़ और बड़े-बड़े पार्क बनाए गए ताकि लगातार ताजी हवा और ऑक्सीजन मिलती रहे।

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