हिन्दी भाषा की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ


'हिंदीशब्द विदेशियों का दिया हुआ है। फारसी में संस्कृत की 'ध्वनि ह हो जाती हैअत: सिंध से हिंद और सिंधी से हिंदी बना। शब्दार्थ की दृष्टि से हिंद (भारत) की किसी भाषा को हिंदी कहा जा सकता है। प्राचीनकाल में मुसलमानों ने इसका प्रयोग इस अर्थ में किया भी है पर वर्तमानकाल में सामान्यतः इसका व्यवहार उस विस्तृत भूखंड को भाषा के लिए होता है जो पश्चिम में जैलसमेरउत्तर पश्चिम में अंबालाउत्तर मेंशिमला से लेकर नेपाल की तराईपूर्व में भागलपुरदक्षिण पूर्व में रायपुर तथा दक्षिण-पश्चिम में खंडवा तक फैली हुई है। 

हिंदी के भेद

हिंदी के मुख्य दो भेद हैं - 
१. पश्चिमी हिंदी 
२. पूर्वी हिंदी।

हिन्दी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं। इनमें से कुछ में अत्यंत उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है। ऐसी बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं। यह बोलियाँ हिन्दी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी। वे हिन्दी की जड़ों को गहरा बनाती हैं। हिन्दी की बोलियाँ और उन बोलियों की उपबोलियाँ हैं जो न केवल अपने में एक बड़ी परंपराइतिहाससभ्यता को समेटे हुए हैं वरन स्वतंत्रता संग्रामजनसंघर्षवर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना संसार सचेत है। 

हिन्दी भाषी क्षेत्र/हिन्दी क्षेत्र/हिन्दी पट्टी— हिन्दी पश्चिम में अम्बाला (हरियाणा) से लेकर पूर्व में पूर्णिया (बिहार) तक तथा उत्तर में बद्रीनाथकेदारनाथ (उत्तराखंड) से लेकर दक्षिण में खंडवा (मध्य प्रदेश) तक बोली जाती है। इसे हिन्दी भाषी क्षेत्र या हिन्दी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र के अंतर्गत 9 राज्यउत्तर प्रदेशउत्तराखंडबिहारझारखंडमध्य प्रदेशछत्तीसगढ़राजस्थानहरियाणा व हिमाचल प्रदेशतथा 1 केन्द्र शासित प्रदेश (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)दिल्लीआते हैं। इस क्षेत्र में भारत की कुल जनसंख्या के 43% लोग रहते हैं।
        
हिन्दी की बोलियों में प्रमुख हैं- अवधीब्रजभाषाकन्नौजीबुंदेलीबघेलीभोजपुरीहरयाणवीराजस्थानीछत्तीसगढ़ीमालवीझारखंडीकुमाउँनीमगही आदि।

बोली— एक छोटे क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा बोली कहलाती है। बोली में साहित्य रचना नहीं होती है।
उपभाषा— अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र का विकास हो जाता है तो वह बोली न रहकर उपभाषा बन जाती है।

भाषा— साहित्यकार जब उस भाषा को अपने साहित्य के द्वारा परिनिष्ठित सर्वमान्य रूप प्रदान कर देते हैं तथा उसका और क्षेत्र विस्तार हो जाता है तो वह भाषा कहलाने लगती है।
एक भाषा के अंतर्गत कई उपभाषाएँ होती हैं तथा एक उपभाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ होती हैं।

सर्वप्रथम एक अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1927 ई. में अपनी पुस्तक 'भारतीय भाषा सर्वेक्षण (A Linguistic Survey of India)' में हिन्दी का उपभाषाओं व बोलियों में वर्गीकरण प्रस्तुत किया। चटर्जी ने पहाड़ी भाषाओं को छोड़ दिया है। वह इन्हें भाषाएँ नहीं मानते।

धीरेन्द्र वर्मा का वर्गीकरण मुख्यतः सुनीति कुमार चटर्जी के वर्गीकरण पर ही आधारित है। केवल उसमें कुछ ही संशोधन किए गए हैं। जैसेउसमें पहाड़ी भाषाओं को शामिल किया गया है।

इनके अलावा कई विद्वानों ने अपना वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। आज इस बात को लेकर आम सहमति है कि हिन्दी जिस भाषासमूह का नाम हैउसमें 5 उपभाषाएँ वर 17 बोलियाँ हैं।

हिन्दी क्षेत्र की समस्त बोलियों को 5 वर्गों में बाँटा गया है। इन वर्गों को उपभाषा कहा जाता है। इन उपभाषाओं के अंतर्गत ही हिन्दी की 17 बोलियाँ आती हैं।

जैसा ऊपर कहा गया हैअपने सीमित भाषाशास्त्रीय अर्थ में हिंदी के दो उपरूप माने जाते हैं - पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी।
पश्चिमी हिन्दी -
पश्चिमी हिंदी के अंतर्गत पाँच बोलियाँ हैं - खड़ी बोलीबांगरूब्रजकन्नौजी और बुंदेली। खड़ी बोली अपने मूल रूप में मेरठबिजनौर के आसपास बोली जाती है। इसी के आधार पर आधुनिक हिंदी और उर्दू का रूप खड़ा हुआ। बांगरू को जाटू या हरियानवी भी कहते हैं। यह पंजाब के दक्षिण पूर्व में बोली जाती है। कुछ विद्वानों के अनुसार बांगरू खड़ी बोली का ही एक रूप है जिसे पंजाबी और राजस्थानी का मिश्रण है। ब्रजभाषामथुरा के आसपास ब्रजमंडल में बोली जाती है। 

हिंदी साहित्य के मध्ययुग में ब्रजभाषा में उच्च कोटि का काव्य निर्मित हुआ। इसलिए इसे बोली न कहकर आदरपूर्वक भाषा कहा गया। मध्यकाल में यह बोली संपूर्ण हिंदी प्रदेश की साहित्यिक भाषा के रूप में मान्य हो गई थी। पर साहित्यिक ब्रजभाषा में ब्रज के ठेठ शब्दों के साथ अन्य प्रांतों के शब्दों और प्रयोगां का भी ग्रहण है। कन्नौजी गंगा के मध्य दोआब की बोली है। इसके एक ओर ब्रजमंडल है और दूसरी ओर अवधी का क्षेत्र। यह ब्रजभाषा से इतनी मिलती जुलती है कि इसमें रचा गया जो थोड़ा बहुत साहित्य है वह ब्रजभाषा का ही माना जाता है। बुंदेली बुंदेलखंड की उपभाषा है। बुंदेलखंड में ब्रजभाषा के अच्छे कवि हुए हैं जिनकी काव्यभाषा पर बुंदेली का प्रभाव है।

पूर्वी हिन्दी -
पूर्वी हिंदी की तीन शाखाएँ हैं - अवधीबघेली और छत्तीसगढ़ी। अवधी अर्धमागधी प्राकृत की परंपरा में है। यह अवध में बोली जाती है। इसके दो भेद हैं - पूर्वी अवधी और पश्चिमी अवधी। अवधी को बैसवाड़ी भी कहते हैं। तुलसी के रामचरितमानस में अधिकांशत: पश्चिमी अवधी मिलती हैं और जायसी के पदमावत में पूर्वी अवधी। बघेली बघेलखंड में प्रचलित है। यह अवधी का ही एक दक्षिणी रूप है। छत्तीसगढ़ी पलामू (बिहार) की सीमा से लेकर दक्षिण में बस्तर तक और पश्चिम में बघेलखंड की सीमा से उड़ीसा की सीमा तक फैले हुए भूभाग की बोली है। इसमें प्राचीन साहित्य नहीं मिलता। वर्तमान काल में कुछ लोकसाहित्य रचा गया है।

हिंदी प्रदेश की तीन उपभाषाएँ और हैं - बिहारीराजस्थानी और पहाड़ी हिंदी।
बिहारी की तीन शाखाएँ हैं - भोजपुरीमगही और मैथिली। बिहार के एक कस्बे भोजपुर के नाम पर भोजपुरी बोली का नामकरण हुआ। पर भोजपुरी का प्रसार बिहार से अधिक उत्तर प्रदेश में है। बिहार के शाहाबादचंपारन और सारन जिले से लेकर गोरखपुर तथा बारस कमिश्नरी तक का क्षेत्र भोजपुरी का है। भोजपुरी पूर्वी हिंदी के अधिक निकट है।

हिंदी प्रदेश की बोलियों में भोजपुरी बोलनेवालों की संख्या सबसे अधिक है। इसमें प्राचीन साहित्य तो नहीं मिलता पर ग्रामगीतों के अतिरिक्त वर्तमान काल में कुछ साहित्य रचने का प्रयत्न भी हो रहा है। मगही के केंद्र पटना और गया हैं। इसके लिए कैथी लिपि का व्यवहार होता है। इसमें कोई साहित्य नहीं मिलता। मैथिली गंगा के उत्तर में दरभगा के आसपास प्रचलित है। इसकी साहित्यिक परंपरा पुरानी है। विद्यापति के पद प्रसिद्ध ही हैं। मध्ययुग में लिखे मैथिली नाटक भी मिलते हैं। 

आधुनिक काल में भी मैथिली का साहित्य निर्मित हो रहा है। राजस्थानी का प्रसार पंजाब के दक्षिण में है। यह पूरे राजपूताने और मध्य प्रदेश के मालवा में बोली जाती है। राजस्थानी का संबंध एक ओर ब्रजभाषा से है और दूसरी ओर गुजराती से। पुरानी राजस्थानी को डिंगल कहते हैं। जिसमें चारणों का लिखा हिंदी का आरंभिक साहित्य उपलब्ध है। राजस्थानी में गद्य साहित्य की भी पुरानी परंपरा है। राजस्थानी की चार मुख्य बोलियाँ या विभाषाएँ हैं- मेवातीमालवीजयपुरी और मारवाड़ी। मारवाड़ी का प्रचलन सबसे अधिक है।

राजस्थानी के अंतर्गत कुछ विद्वान्‌ भीली को भी लेते हैं। पहाड़ी उपभाषा राजस्थानी से मिलती जुलती हैं। इसका प्रसार हिंदी प्रदेश के उत्तर हिमालय के दक्षिणी भाग में नेपाल से शिमला तक है। इसकी तीन शाखाएँ हैं - पूर्वीमध्यवर्ती और पश्चिमी। पूर्वी पहाड़ी नेपाल की प्रधान भाषा है जिसे नेपाली और परंबतिया भी कहा जाता है। मध्यवर्ती पहाड़ी कुमायूँ और गढ़वाल में प्रचलित है। इसके दो भे हैं - कुमाउँनी और गढ़वाली। ये पहाड़ी उपभाषाएँ नागरी लिपि में लिखी जाती हैं। इनमें पुराना साहित्य नहीं मिलता। आधुनिक काल में कुछ साहित्य लिखा जा रहा है। कुछ विद्वान्‌ पहाड़ी को राजस्थानी के अंतर्गत ही मानते हैं।

हिन्दी भाषा का भौगोलिक विस्तार काफी दूरदूर तक है जिसे तीन क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है:-
(क) हिन्दी क्षेत्र – हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी की मुख्यत: सत्रह बोलियाँ बोली जाती हैंजिन्हें पाँच बोली वर्गों में इस प्रकार विभक्त कर के रखा जा सकता है- पश्चिमी हिन्दीपूर्वी हिन्दीराजस्थानी हिन्दीपहाडी हिन्दी और बिहारी हिन्दी।
(ख) अन्य भाषा क्षेत्र– इनमें प्रमुख बोलियाँ इस प्रकार हैं- दक्खिनी हिन्दी (गुलबर्गीबीदरीबीजापुरी तथा हैदराबादी आदि)बम्बइया हिन्दीकलकतिया हिन्दी तथा शिलंगी हिन्दी (बाजार-हिन्दी) आदि।
(ग) भारतेतर क्षेत्र – भारत के बाहर भी कई देशों में हिन्दी भाषी लोग काफी बडी संख्या में बसे हैं। सीमावर्ती देशों के अलावा यूरोपअमेरिकाआस्ट्रेलियाअफ्रीकारुसजापानचीन तथा समस्त दक्षिण पूर्व व मध्य एशिया में हिन्दी बोलने वालों की बहुत बडी संख्या है। लगभग सभी देशों की राजधानियों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी एक विषय के रूप में पढी-पढाई जाती है। 

भारत के बाहर हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ – ताजुज्बेकी हिन्दीमारिशसी हिन्दीफीज़ी हिन्दीसूरीनामी हिन्दी आदि हैं।
  • पश्चिमी हिंदी
  • खड़ी बोली
  • बृजभाषा
  • हरियाणवी
  • बुंदेली
कन्नौजी : उत्तर प्रदेश के इटावाफ़र्रूख़ाबादशाहजहांपुरकानपुरहरदोई और पीलीभीतजिलों के ग्रामीणांचल में बहुतायत से बोली जाती है।

पूर्वी हिंदी
  • अवधी
  • बघेली
  • छत्तीसगढ़ी
  • राजस्थानी
  • मारवाड़ी भाषा
  • जयपुरी
  • मेवाती
  • मालवी
पहाड़ी
  • पूर्वी पहाड़ी जिसमें नेपाली आती है
  • मध्यवर्ती पहाड़ी जिसमें कुमाऊंनी और गढ़वाली आती है।
  • पश्चिमी पहाड़ी जिसमें हिमांचल प्रदेश की अनेक बोलियां आती हैं।

बिहारी भाषा
  • मैथिली
  • भोजपुरी
  • मगही
  • अंगिका
  • बज्जिका
  • हिंदीतर प्रदेशों की हिंदी बोलियाँ
  • बंबइया हिंदी
  • कलकतिया हिंदी
  • दक्खिनी

विदेशों में बोली जाने वाली हिंदी बोलियाँ
  • उजबेकिस्तान
  • मारिशस
  • फिजी
  • सूरीनाम
  • मध्यपूर्व
  • त्रीनीदाद और टोबैगो
  • दक्षिण अफ्रीका
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